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संगति का जीवन में बड़ा प्रभाव, सत्पुरुषों से हो संगति तो जीवन बने सत्संग -मुनि आदित्यसागरजी महाराज।
केकड़ी। संगति का जीवन में बड़ा प्रभाव पड़ता है। गुरु द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह और कर्ण जैसे श्रेष्ठ पुरुषों का भी दुर्योधन की संगति के कारण बुरा अंत हुआ। वस्
Govind Vaishnav
Chief Editor
Jun 02, 2024 • 7:01 AM IST
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केकड़ी। संगति का जीवन में बड़ा प्रभाव पड़ता है। गुरु द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह और कर्ण जैसे श्रेष्ठ पुरुषों का भी दुर्योधन की संगति के कारण बुरा अंत हुआ। वस्तु बुरी नहीं होती, बल्कि उसमें हमारी भावनाएं व आसक्ति बुरी होती है। जब हम मंदिर जाते हैं तो भगवान की संगति से भावनाएं सर्वोत्तम हो जाती है। व्यक्ति यदि गुरुओं व श्रेष्ठ पुरुषों की संगति रखें तो उसकी भावनायें उत्तम हो जाती है, यही भावनाएं सच्चे सुख की उत्पत्ति कर उसके जीवन में कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। यह बात श्रुत संवेगी दिगम्बर जैन मुनि श्री आदित्यसागरजी महाराज ने दिगंबर जैन चैत्यालय भवन में ग्रीष्मकालीन प्रवचनमाला के अंतर्गत रविवार को सुबह 'मेरी भावना' काव्य के सूक्तकों की व्याख्या करते हुए कही।

उन्होंने कहा कि संगति हर पल हमें प्रभावित करती है। यह सामान्य सी बात है। जब क्रिकेट देखते हैं तो भावना होती है कि भारत जीते। नए जूते पहनते हैं, तो बार-बार जूते देखने का भाव होता है। यही स्थिति नई अंगूठी या नए वस्त्र पहनते समय भी रहती है। वहीं जब पंचकल्याणक देखते हैं तो भगवान के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक की अनुमोदना के भाव होते हैं। अर्थात संगति का असर अवश्य रहता है। इसलिए हमें संगति करते समय अत्यंत जागरूक व विवेकवान रहना चाहिए। सावधानी रहे कि प्रमादवश गलत संगति न हो जाये। संगति सदैव सत्पुरुषों से हो तो हमारे सम्पूर्ण जीवन में सत्संग हो जाएगा। साधुओं की संगति से बुद्धि प्रखर हो जाती है। हमें हमेशा यह भावना भानी चाहिए कि हमें नियमित साधुओं की संगति मिले।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति व्यक्ति को सेठ बनाने की है, जबकि विदेशी संस्कृति व्यक्ति को नौकर बनाती है। प्रत्येक श्रावक में महाव्रत धारण करने की योग्यता है, पर संगति के अभाव में वह महाव्रत धारण नहीं कर पाता। हमें सिंह प्रवृत्ति से अष्टकर्मों का नाश करना चाहिए। जो साधुओं का ध्यान करते हैं, उन्हें साधुता प्राप्त होती ही होती है। जो दृश्य हम बाहर की ओर देखते हैं, उसका हमारे जीवन पर अवश्य प्रभाव पड़ता है। हमें ऐसी भावना करनी चाहिए कि आंखे खोलें तो जिन दिखे और बंद करें तो निज दिखे। सारा फर्क भावनाओं का है। भावना ही भगवत्ता प्रदान करती है।

धर्मसभा के प्रारंभ में केकड़ी के श्रीमती मुन्नीदेवी, महेंद्रकुमार, सुनीतादेवी, हार्दिक व छायांश पाटनी परिवार ने आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के चित्र का अनावरण व दीप प्रज्ज्वलन किया तथा मुनि श्री आदित्यसागरजी महाराज के पाद प्रक्षालन कर शास्त्र भेंट किये। धर्मसभा के दौरान हिम्मतनगर, भोपाल, छतरपुर, बूंदी, कोटा व अजमेर से आये श्रावकों ने भी मुनिसंघ के समक्ष श्रीफल अर्पित किए। धर्मसभा का संचालन महावीर टोंग्या ने किया। शनिवार को क्षेत्रीय विधायक शत्रुघ्न गौतम ने भी धर्मसभा में शामिल होकर मुनि आदित्यसागरजी महाराज व मुनिसंघ का आशीर्वाद लिया।
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