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मन में लालसा व तृष्णा का भाव ही दुख का कारण, साम्यभाव है धर्म का सार- मुनि आदित्यसागरजी महाराज।
केकड़ी। श्रुत संवेगी दिगम्बर जैन मुनि आदित्यसागरजी महाराज ने ग्रीष्मकालीन प्रवचनमाला के अंतर्गत शुक्रवार को दिगम्बर जैन चैत्यालय भवन में प्रवचन करते हुए कहा
Govind Vaishnav
Chief Editor
May 31, 2024 • 5:53 AM IST
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केकड़ी। श्रुत संवेगी दिगम्बर जैन मुनि आदित्यसागरजी महाराज ने ग्रीष्मकालीन प्रवचनमाला के अंतर्गत शुक्रवार को दिगम्बर जैन चैत्यालय भवन में प्रवचन करते हुए कहा कि जिन साधुओं के मन में विषयों के प्रति किसी भी तरह की आसक्ति नहीं है, वही सुखी है और दूसरों के लिए भी सच्चे सुख का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। दिगंबर मुनि धन्य है, जो कंकड़-पत्थर पर नंगे पांव चलते हैं, जमीन पर सोते हैं। उन्हें किसी प्रकार का परिग्रह नहीं होता और न ही मृत्यु का भय होता है। वे स्पर्श,रसना, घ्राण, चक्षु व कर्ण इंद्रियों के विषयों से रहित होते हैं।

उन्होंने जैन इतिहास के सूक्ष्म अन्वेषक व सुप्रसिद्ध लेखक पंडित जुगलकिशोर जैन मुख्तार 'युगवीर' द्वारा रचित मेरी भावना' काव्य के सूक्तकों की व्याख्या करते हुए कहा कि मुनि सदैव दूसरों के प्रति साम्य भाव रखते हैं, किसी भी परिस्थिति में मन में कषाय भाव उत्पन्न नहीं होने देते। उन्होंने कहा कि साम्य भाव ही जीवन का वह कवच है, जो हमें अशुभ परिणामों से सुरक्षा प्रदान करता है। धर्म का सार ही साम्यभाव है। इससे ही धर्म की शुरुआत होती है। ये ही सर्वत्र सुख शांति का प्रदाता है। उन्होनें कहा कि हर परिस्थिति में मन की प्रसन्नता को बनाये रखना ही साम्यभाव है। यह हमारी चेतना को निखारता है। यह भी तप ही है। कटु शब्द को सुनकर नजरअंदाज करना भी एक तप है। जो धर्म की शरण आता है वह शीघ्र भव पार हो जाता है। मनुष्य के जीवन में दु:ख का कारण उसके मन में लालसा और तृष्णा के भाव हैं, जो विकारों को जन्म देते हैं, इनसे बचना होगा।

प्रारम्भ में प्रेमचंद, मनोजकुमार, वैभव व यश पांड्या परिवार ने आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलन किया तथा भीलवाड़ा के हीराचंद, मनीष व नीरज शाह परिवार ने मुनि श्री आदित्यसागरजी महाराज के पाद प्रक्षालन किये। सभा का संचालन महावीर टोंग्या ने किया।

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