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भावनाएं हमेशा पूरी होती है, परंतु याचनायें नहीं। दया व मैत्री भाव ही धर्म का मूल सिद्धांत -मुनि आदित्यसागर जी महाराज
केकड़ी-जो मन से सच्ची भावना भाते हैं, उनकी विशुद्धि बढ़ती है। भावनाऐं हमेशा पूरी होती है, पर याचनाएं नहीं। भावना में याचना नहीं होनी चाहिए, जो याचना क
Govind Vaishnav
Chief Editor
Jun 08, 2024 • 5:31 AM IST
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केकड़ी-जो मन से सच्ची भावना भाते हैं, उनकी विशुद्धि बढ़ती है। भावनाऐं हमेशा पूरी होती है, पर याचनाएं नहीं। भावना में याचना नहीं होनी चाहिए, जो याचना करते हैं, उनकी विशुद्धि चली जाती है। यह बात श्रुत संवेगी दिगम्बर जैन मुनि आदित्यसागरजी महाराज ने ग्रीष्मकालीन प्रवचनमाला के अंतर्गत शनिवार को दिगम्बर जैन चैत्यालय भवन में प्रवचन करते हुए कही।

उन्होंने जैन इतिहास के सूक्ष्म अन्वेषक व सुप्रसिद्ध लेखक पंडित जुगलकिशोर जैन मुख्तार 'युगवीर' द्वारा रचित मेरी भावना' काव्य के सूक्तकों की व्याख्या करते हुए कहा कि यदि व्यक्ति 'मेरी भावना' काव्य को समझकर उसके अर्थों को सही रूप से जीवन में उतारे तो निश्चित तीर्थंकर प्रकृति का बंध होगा। भावना उसी से भानी चाहिए, जिनमें उसे पूरे करने की क्षमता हो, अतः भावना पंच परमेष्ठि के सामने ही भानी चाहिए और मस्तक भी केवल उन्हीं के सामने झुकाना चाहिए।
उन्होनें कहा कि यदि हमारी श्रद्धा सच्ची है, तो गुरु हमें जो भी मंत्र देते हैं, वह हमारे जीवन को बदल देते हैं। पंच परमेष्ठि की आराधना से हमारे जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। हमें अपने जीवन में एक बार जिनबिंब की स्थापना अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि जब तक जिन बिंब रहेगा, तब तक उसका छठा भाग पुण्य के रूप में हमें मिलता रहेगा। उन्होनें कहा कि बांटने से चीजे बढ़ती है। मात्र संग्रह करने से चीजें एक दिन चली जाती है। महान लोगों का स्वभाव चीजें जोड़ने का नहीं, छोड़ने का होता है। उन्होनें पद्यात्मक शैली में कहा कि 'निकलता है हर दिन सूरज, यह बताने के लिए कि उजाले बांटने से, उजाले कम नहीं होते'।

हमें सभी पर सदैव दया व मैत्री भाव रखना चाहिए, ये ही धर्म का मूल सिद्धांत है। तब सब भी हमसे मैत्री भाव रखेंगे। परिवार में सास-बहु, पिता-पुत्र, भाई-भाई, भाई-बहन, सभी सदस्यों के बीच परस्पर मैत्री भाव होना चाहिए, जीवन स्वमेव सुख से भरने लगेगा। हमारे मन में दीन दुखी जीवों के प्रति निस्वार्थ करुणा भाव विद्यमान रहना चाहिए। परन्तु जब भी किसी की मदद करें, तो छिपा कर करें, छपा कर नहीं, अर्थात मदद का प्रचार न करें। दया कभी भी लाभ प्राप्त करने की भावना से न करें।

उन्होनें कहा कि बुरे वक्त में जो घबरा जाते हैं, बुरा वक्त उनके यहां वक्त ठहर जाता है और जो मुस्कुरा कर सह जाते हैं, उनके यहां अच्छा वक्त वापस आकर ठहर जाता है। अच्छा वक्त आसानी से नहीं मिलता। सहन करने से ही बुरा वक्त टलता है। जब व्यक्ति दुखी होता हैं, तो दूसरों को दोष दिया करता है, जबकि दोष स्वयं को देना चाहिए। उन्होनें उदाहरण देते हुए कहा कि गर्मी के दिनों में लोग छाता तो लगाया करते हैं, लेकिन दोष सूरज को नहीं देते। व्यक्ति दूसरों को दोष देने की गलती कभी न करें। कामयाब होने के लिए अकेले ही मेहनत करनी पड़ती है, दुनिया तो कामयाब होने के बाद साथ लगती है।

धर्मसभा के प्रारंभ में भागचंद, ज्ञानचंद, सुनील, बसंत, भावित व उमंग जैन परिवार धूंधरी वालों ने आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलन किया तथा श्री दिगंबर जैन महिला मंडल की ओर से श्रावकों ने मुनिसंघ के पाद प्रक्षालन कर उन्हें शास्त्र भेंट किये। सभा का संचालन महावीर टोंग्या ने किया।
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