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त्याग और तप के बिना मोक्ष असंभव: आचार्य सुंदर सागर महाराज
जैन धर्म वो धर्म है जिसमे त्याग व तप करके मोक्ष मार्ग का रास्ता चुन सकते है। त्याग व तप के बिना स्वर्ग व मोक्ष मिलने वाला नहीं है ।"पर" वस्तु के प्रति जितना
Govind Vaishnav
Chief Editor
Jun 22, 2024 • 7:24 AM IST
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जैन धर्म वो धर्म है जिसमे त्याग व तप करके मोक्ष मार्ग का रास्ता चुन सकते है। त्याग व तप के बिना स्वर्ग व मोक्ष मिलने वाला नहीं है ।"पर" वस्तु के प्रति जितना राग रहेगा वह अपने जीवन का कल्याण नहीं कर पायेगा, मोह रहेगा तो मिथ्यात्व बढ़ेगा,वह अपनो के लिए मोहवश गलत कार्य करेगा ओर मोक्ष मार्ग से भटक जाएगा। प्रातःकालीन नित्यनियम पूजा, जिनाभिषेक, शांतिधारा के पश्चात आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज ने श्री नेमिनाथ जैन मंदिर बोहरा कॉलोनी में ग्रीष्म कालीन प्रवास के दौरान ऋषभनाथ जिनालय में अपने प्रवचन के दौरान कहे ।

उन्होंने कहा कि दूसरों की संपत्ति पर नजर डालोगे तो चोर कहलावोगे, अपनी संपत्ति से संतुष्ट रहोगे तो भव पार हो जावोगे।आचार्य श्री ने कहा कि कोई भी कार्य बे मन से या जबरदस्ती करने या करवाने से उसमें सफलता नहीं मिलती है परंतु अच्छे कार्य के लिए जबरदस्ती भी जरूरी होती है जिस प्रकार किसी बालक को बीमार होने पर जबरदस्ती दवाई देनी पड़ती है, इसी प्रकार किसी को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए जबरदस्ती करनी पड़े तो कोई बुराई नहीं है ।जब तक मनुष्य मोह रूपी रस पीता रहेगा उसे मोक्ष मार्ग नहीं मिलने वाला है ।भगवान महावीर व आचार्य सन्मति सागर महाराज के चित्र अनावरण व दीप प्रज्जवल अशोक कुमार सिंघल,पारस जैन, भाग चंद जैन रामथला ने किया ।आचार्य श्री के पाद प्रक्षालन पारस मल , महावीर प्रसाद ,लाभ चंद बघेरा ने किया ।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका संस्कृति मति माताजी ने कहा कि अनादिकाल से जीव निगोद काल की यात्रा कर रहा है, जब जीव का पुण्य काल आएगा तभी वह निगोदकाल से निकलकर मोक्ष मार्ग प्राप्त करेगा ।पुण्य कर्म की कमी से जीव को तिर्यंच गति का जीवन मिलता है, उसे ना खाने को पर्याप्त मिलता है, ना रहने को घर मिलता है, ना सोने को बिस्तर मिलता है, हम भाग्यशाली है जो मनुष्य पर्याय मिला है ।मनुष्य जीवन मे संयम धारण करने व पुण्य कार्य करने से हमें अगले भव में तिर्यंच जीव बनने से बच सकते है ।

आर्यिका माताजी ने कहा कि जो वस्तु हमारे पास व्यर्थ पड़ी है,उसका वर्षों तक उपयोग नहीं किया है फिर भी हम उस वस्तु का मोह नहीं छोड़ पाते है ।किसी गरीब व जरूरतमंद को नहीं देते है । यह परिग्रह, पाप की श्रेणी में आता है, ऐसा भाव नरक का द्वार होता है । उस वस्तु का मोह छोड़ जरूरत मंद को दे देना चाहिए।कार्यक्रम में चंद्रकला जैन ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया ।कार्यक्रम का संचालन भागचंद जैन ने किया ।
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