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केकड़ी में श्रावकाचार अनुशीलन विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी संपन्न। निर्मल भाव से षटआवश्यक कर्म करें श्रावक -आचार्य सुन्दरसागर महाराज। शरीर व मन के समस्त दुखों का कारण है लोभ -मुनि आदित्यसागर महाराज।
केकड़ी। आचार्य सुंदरसागर महाराज एवं श्रुत संवेगी मुनि आदित्यसागर महाराज के सानिध्य में यहां दिगम्बर जैन चैत्यालय भवन में श्रावकाचार अनुशीलन विषय पर आयोजित दो
Govind Vaishnav
Chief Editor
Jun 16, 2024 • 7:33 AM IST
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केकड़ी। आचार्य सुंदरसागर महाराज एवं श्रुत संवेगी मुनि आदित्यसागर महाराज के सानिध्य में यहां दिगम्बर जैन चैत्यालय भवन में श्रावकाचार अनुशीलन विषय पर आयोजित दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी आज रविवार को दोपहर सम्पन्न हुई। इस अवसर पर आचार्य सुंदरसागर महाराज ने प्रवचन करते हुए कहा कि पूजन-अभिषेक आदि क्रियाओ की विसंगतियों को दूर किया जाना आवश्यक है। श्रावकों को निर्मल भाव धारण करके, षट-आवश्यक कर्म नित्य रूप से करने चाहिए। समाज में फैल रही विसंगतियों को दूर कर, मंदिरों में नित्य आवश्यक क्रियाओं का नियमित रूप से श्रेष्ठतम संचालन किया जाना चाहिए।

धर्मसभा में मुनि आदित्यसागरजी महाराज ने प्रवचन करते हुए कहा कि यदि आपको हमेशा सफलता हासिल करनी है, तो उसके लिए आपको सफल लोगों से मिलकर उनकी सफलता के राज जानने होंगे और असफल लोगों से मिलकर उनकी असफलता के कारण जानने होंगे। उन्होनें लोभ को दुख का कारण बताते हुए कहा कि शरीर व मन के समस्त रोग लोभ से पैदा होते हैं। लोभ की मात्रा घटती नहीं, बल्कि दिनों दिन बढ़ती चली जाती है। ज्यों-ज्यों लाभ होता है त्यों-त्यों लोभ और अधिक मात्रा में बढ़ता चला जाता है। आज तक जितने भी युद्ध -मन मुटाव -हिसा -अत्याचार या अनाचार हुए हैं उसके पीछे एक ही कारण लोभ का रहा है। इंसान की इच्छाएं अनंत होती हैं जो कदापि पूर्ण नहीं हो पाती और इंसान जिस प्रकार खाली हाथ आता है, उसी प्रकार एक दिन खाली हाथ ही प्रस्थान कर जाता है। इस लोभ को जीतने के लिए संतोष ही एकमात्र मार्ग है। उन्होनें इस संदर्भ में परिग्रह परिणाम व्रत की व्याख्या करते हुए कहा कि वस्तुओं की मर्यादाओं से ही मन पर काबू पाया जा सकता है।

संगोष्ठी के अंतर्गत रविवार को प्रातःकालीन सत्र में रजवास के पंडित विनोद जैन ने अभिषेक और शांति धारा की व्याख्या की। बड़ौत के डॉ श्रेयांस जैन ने जैनागम के परिप्रेक्ष्य में गुरु के महत्व का वर्णन किया। सत्र की अध्यक्षता जयपुर के डॉ शीतलचंद जैन ने की तथा संचालन नई दिल्ली के प्रोफेसर अनेकांत कुमार जैन ने किया। सत्र के दौरान डॉ श्रेयांश जैन का अखिल भारतीय दिगंबर जैन शास्त्री परिषद के पांचवी बार निर्विरोध अध्यक्ष बनने पर स्थानीय समाज की ओर से सम्मान किया गया। संगोष्ठी का अंतिम सत्र दोपहर को सम्पन्न हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ श्रेयांश जैन ने की तथा संचालन सनावद के राजेंद्र जैन ने किया। सत्र के अंतर्गत डॉ सुनील जैन संचय ने दान के सार्थक स्वरूप एवं इसमें पनपती विकृतियों के विषय में, ब्रह्मचारी अनिल जैन ने दान एवं संयम के विषय में, पंडित श्रेयांश जैन सिंघई ने श्रावक धर्म में स्वाध्याय की भूमिका के बारे में एवं अंत में डॉ शीतल चंद जैन ने अविरत सम्यक दृष्टि के सदाचार के विषय में अपने विचार प्रस्तुत किये। अंत में स्थानीय समाज द्वारा सभी विद्वानों का सम्मान किया गया। प्रारम्भ में मैनादेवी, अंकित, अर्पित व अंकुर पाटनी परिवार ने आचार्य विशुद्धसागर महाराज के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलन किया तथा मुनिसंघ के पाद प्रक्षालन कर उन्हें शास्त्र भेंट किये।

सोमवार को होगा केकड़ी से विहार
केकड़ी के दिगम्बर जैन चैत्यालय भवन में ग्रीष्मकालीन प्रवास कर रहे श्रुत संवेगी मुनि आदित्यसागर महाराज का ससंघ सोमवार शाम को यहां से कोटा के लिए पैदल विहार होगा। समाज के अरिहंत बज ने बताया कि विगत बीस दिनों से आचार्य विशुद्ध सागर जी के शिष्य मुनि आदित्यसागर महाराज व संघस्थ मुनि अप्रमितसागर महाराज, मुनि सहजसागर महाराज व क्षुल्लक श्रेयसागरजी महाराज का यहां ग्रीष्मकालीन प्रवास चल रहा है। उन्होनें बताया कि मुनिसंघ का शाम छह बजे यहां से विहार होकर मंगलवार को सुबह ग्राम पारा में मंगल प्रवेश होगा।
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